डेटा ट्रैकिंग और एआई दुरुपयोग के दौर में रांची से जक्टर (ZKTOR) की एंट्री, प्राइवेसी को सिस्टम डिज़ाइन से जोड़ने का दावा

The Ranchi News
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रांची। मोबाइल और सस्ते इंटरनेट ने सोशल मीडिया को आम लोगों की रोजमर्रा की आदत बना दिया है। शहरों से लेकर गांव-देहात तक हर उम्र के लोग अलग-अलग सोशल प्लेटफॉर्म्स पर समय बिता रहे हैं। लेकिन इसके साथ व्यवहार ट्रैकिंग, प्रोफाइलिंग और डेटा कलेक्शन को लेकर चिंताएं भी लगातार बढ़ी हैं। एआई के आने के बाद फोटो और वीडियो के दुरुपयोग का खतरा और गंभीर हो गया है, खासकर महिलाओं के लिए। इसी पृष्ठभूमि में रांची से जुड़ा भारतीय सुपर ऐप जक्टर (ZKTOR) सामने आया है, जो प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा को किसी पॉलिसी या सेटिंग नहीं, बल्कि सिस्टम डिज़ाइन का हिस्सा बनाने की बात करता है।

प्रेस क्लब रांची में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान जक्टर (Zktor ) को मीडिया के सामने पेश किया गया। इस मौके पर सॉफ्टा टेक्नोलॉजीज के सीईओ और जक्टर के शिल्पकार सुनील कुमार सिंह ने प्लेटफॉर्म की सोच और तकनीकी ढांचे को लेकर जानकारी दी। उन्होंने कहा कि जक्टर का आर्किटेक्चर प्राइवेसी और डेटा सेफ्टी बाय डिज़ाइन के मूल सिद्धांतों पर आधारित है। सुनील कुमार सिंह के अनुसार जक्टर का सर्वर जीरो नॉलेज आर्किटेक्चर पर काम करता है। उन्होंने बताया कि जहां अधिकांश वैश्विक प्लेटफॉर्म्स यूज़र्स के कंटेंट, व्यवहार और मेटाडेटा को अलग-अलग स्तरों पर सिस्टम के भीतर पढ़ते और प्रोसेस करते हैं, वहीं जक्टर को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि प्लेटफॉर्म की ओर से यूज़र कंटेंट तक सीधी पहुंच तकनीकी रूप से सीमित रहे। इसी वजह से खुद जक्टर के इंजीनियर्स भी यूज़र्स के डेटा को पढ़ने में सक्षम नहीं होते।

एआई के दौर में कंटेंट का दुरुपयोग एक बड़ी चुनौती बन चुका है। आम सोशल प्लेटफॉर्म्स से वीडियो को सीधे या अलग-अलग टूल्स के जरिए डाउनलोड किया जा सकता है, एआई से उनमें बदलाव कर दुरुपयोग का खतरा बना रहता है। भारत में महिलाओं के लिए यह लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। जक्टर अपने नो-यूआरएल कंटेंट स्ट्रक्चर को इसका तकनीकी समाधान बताता है। कंपनी का कहना है कि प्लेटफॉर्म पर अपलोड किए गए फोटो या वीडियो का कोई सार्वजनिक वेब लिंक नहीं होता, जिससे कंटेंट को बाहर निकालना और दुरुपयोग करना काफी हद तक मुश्किल हो जाता है। जक्टर इसे डिजिटल गरिमा से जोड़कर देखता है।

Zktor जक्टर को एक ऑल-इन-वन भारतीय सुपर ऐप के रूप में पेश किया गया है। इसमें सोशल मीडिया फीड, शॉर्ट वीडियो, लॉन्ग वीडियो और पूरी तरह एन्क्रिप्टेड मैसेंजर एक ही ऐप में उपलब्ध होने की बात कही गई है। सुनील कुमार सिंह ने बताया कि आने वाले समय में प्लेटफॉर्म पर स्थानीय नौकरियों और बिजनेस लिस्टिंग जैसी सुविधाएं भी जोड़ी जाएंगी, ताकि स्थानीय स्तर पर उपयोगिता और रोजगार दोनों को बढ़ावा मिल सके। कंपनी का दावा है कि जक्टर प्राइवेसी बाय डिज़ाइन, नो-यूआरएल मीडिया और जीरो नॉलेज आर्किटेक्चर के साथ-साथ Data Sovereignty सर्वर इन्फ्रास्ट्रक्चर के जरिए डेटा संप्रभुता के सिद्धांतों को भी ध्यान में रखता है। इस दृष्टिकोण को भारत के डीपीडीपी DPDP और यूरोप के जीडीपीआर GDPR जैसे डेटा सुरक्षा कानूनों की भावना से जोड़कर देखा जा रहा है.

जक्टर में ग्रामीण भारत के यूज़र्स को ध्यान में रखकर फीचर्स तैयार किए गए हैं और फिनलैंड के उच्च तकनीकी मानकों को आर्किटेक्चर स्तर पर अपनाने की बात कही गई है। एआई के युग में बढ़ती प्राइवेसी चिंताओं के बीच जक्टर को Gen Z और महिलाओं की पसंद के रूप में देखा जा रहा है। कंपनी के अनुसार जेक्टर फिलहाल भारत, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में बीटा संस्करण में उपलब्ध है। दक्षिण एशिया में इसकी मास टेस्टिंग चल रही है। ऐप को गूगल प्ले स्टोर और एप्पल ऐप स्टोर दोनों से डाउनलोड किया जा सकता है।

फंडिंग को लेकर पूछे गए सवाल पर सुनील कुमार सिंह ने बताया कि जक्टर के विकास में न तो भारत सरकार और न ही फिनलैंड सरकार से किसी तरह का सरकारी अनुदान लिया गया है और न ही विदेशी वीसी (VC) फंडिंग ली गई है। उनका कहना है कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि प्लेटफॉर्म का तकनीकी विज़न किसी राजनीतिक या कॉरपोरेट दबाव से प्रभावित न हो। उन्होंने जक्टर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल आत्मनिर्भर भारत और विज़न 2047 की सोच से जुड़ा हुआ बताया, हालांकि इसके विकास के लिए किसी तरह की सरकारी सहायता नहीं ली गई।

रोज़गार और मोनेटाइजेशन से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि प्लेटफॉर्म के मोनेटाइजेशन मॉडल में क्रिएटर्स को कमाई का फ्लैट 70 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा। साथ ही हाइपरलोकल ऑपरेशंस के जरिए टियर-2 से टियर-4 शहरों में मॉडरेशन, कम्युनिटी ऑपरेशंस और अन्य स्थानीय भूमिकाओं के आधार पर हजारों युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है।

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